बोकारो का वो स्कूल जहां गंदे तालाब का पानी पीने को मजबूर है स्कूली बच्चे..

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देश बदल रहा है…आगे बढ़ रहा है….शहरों में आसमान को छूती इमारतें और बुलेट ट्रेन चलाने की सारी कवायद तो हो रही है लेकिन जब बात छोटे शहरों की आती है तो सारे दावे खोखले नजर आते हैं| यहां तो बच्चों को साफ पानी तक मयस्सर नहीं है| हम बात कर रहे हैं बोकारो के गोमिया के सियारी गांव की जहां सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को पीने का साफ पानी तक मुहैया नहीं कराया गया है| यहां स्कूली बच्चों को मध्याहन भोजन तो स्कूल से मिल जाता है लेकिन पानी पीने के लिए इन बच्चों को पास एक गंदे तालाब किनारे जाना पड़ता है| पानी की इस व्यवस्था के चलते बच्चे वहीं तालाब किनारे बैठकर खाना खाते हैं|

आदिवासी बहुल इस गांव के स्कूल में एक-दो नहीं बल्कि 255 छात्र पढ़ते हैं लेकिन इनके लिए यहां पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है| मजबूरी में इन बच्चों को तालाब का गंदा पानी पीना पड़ता है|गनीमत ये है कि बच्चों को दिये जाने वाले खाने के लिए साफ पानी का उपयोग किया जाता है| यहां काम करने वाले रसोइया 2 किलोमीटर दूर झरने से पानी लाते है तब जाकर बच्चों का खाना बन पाता है| हालांकि ये भी काम कोई आसान नहीं, इसके लिए काफी तकलीफ उठानी पड़ती है|यहां काम करने वाली तीन महिला रसोइया बताती हैं कि वो तीन मिलकर तीन बार में 9 डेकची पानी लाती है तब जाकर 255 बच्चों का खाना बन पाता है|

ऐसा नहीं है कि यहां पानी की कभी व्यवस्था नहीं थी|स्कूल के पास दो हैंडपंप थे लेकिन वो भी बिना काम के| एक हैंडपंप से पानी नहीं निकलता और दूसरा हैंडपंप जिससे पानी मिलता था उसे पीएचडी तेनुघाट बिना किसी सूचना के और बिना किसी बैकल्पिक व्यवस्था के उखाड़ ले गई| स्कूल के प्रधानाध्यापक महेन्द्र कुमार नायक का कहना है कि हैंडपंप पूरी तरह दुरूस्त था जिसे दो महीने पहले ही बोरिंग कराया गया था, स्कूल के बच्चों तो उस हैंडपंप से पूरा पानी भी मिल रहा था| हैंडपंप रहने से बच्चे पानी भी पीते थे और उनका खाना भी भी उसी पानी से पकता था| लेकिन पीएचडी के लोग वो हैंडपंप उखाड़ ले गए| श्री नायक का कहना है कि उन्होंने 255 बच्चों की दुहाई दी लेकिन अधिकारियों ने एक नहीं सुनी।

आपको जानकर हैरानी होगी कि जिस तालाब का पानी ये बच्चे पी रहे हैं उसके आसपास सिर्फ और सिर्फ गंदगी है| चारों तरफ मलमूत्र फैला हुआ है और तो और गांव के लोग भी इसी तालाब में नहाते, अपने बर्तन-कपड़े धोते हैं|रही सही कसर पशुओं को नहला कर पूरी कर देते हैं| इस सब के कारण पानी की स्थिति ऐसी बन जाती है कि इसे छूना भी बीमारी को आंमत्रण देना है|इस सब के बावजूद बच्चे उस पानी में अपने बर्तन धोते हैं, मुंह-हाथ धोते हैं तथा कुल्ला करते हैं| छोटे बच्चे तो पानी पी भी लेते हैं|ऐसे में वहां से हैंडपंप का उखाड़ लेना संवेदनहीनता को दर्शाता है| इस पूरे मामले पर जिला प्रशासन का कहना है कि वहां जलस्तर नहीं था इसलिए हैंडपंप को उखाड़ लिया गया|

जिला प्रशासन के ऐसे बयान से क्या समझा जाए? क्या स्कूल के प्रिंसिपल साहब झूठ बोल रहे हैं?.चलिए साहब मान लिया कि हैंडपंप खराब था, जल स्तर नीचे था और इसलिए पीएचडी वाले उसे उखाड़ ले गए लेकिन क्या बच्चों को ऐसी स्थिति में छोड़ना सही था? इन बच्चों का क्या कसूर जो उन्हें बीमारियां सौगात में मिल रही है? स्कूल में पानी की व्यवस्था नहीं है..क्या ये झूठ है…बच्चे तालाब के किनारे जाकर मलमूत्र के बीच बैठकर खाना खाते हैं ये भी झूठ है…और गंदे पानी से हाथ-मुहं बर्तन धोते हैं, कुल्ला करते हैं, यह भी झूठ है?…तस्वीरों को देखिए और फिर कहिए क्या ऐसे पढ़ेगा झारखंड और ऐसे बढ़ेगा झारखंड?

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